मनरेगा और जी-राम-जी: कल्याणकारी राज्य की बदलती परिभाषा

कल्याणकारी राज्य की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक के साथ संकट के समय कैसे खड़ा होता है। भारत जैसे देश में, जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था आज भी अस्थिर कृषि, मौसमी श्रम और असंगठित रोज़गार पर टिकी है, वहाँ रोज़गार की सुरक्षा केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता का प्रश्न है। इसी संदर्भ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम—मनरेगा—ने वर्ष 2005 में भारतीय कल्याणकारी राज्य की परिभाषा को नया अर्थ दिया था। अब, विकसित भारत @2047 की राष्ट्रीय परिकल्पना के साथ प्रस्तुत विकसित भारत—रोज़गार एवं आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण), यानी जी-राम-जी, उसी परिभाषा को नए सिरे से गढ़ने का दावा कर रहा है।

मनरेगा केवल एक योजना नहीं था; वह एक विधिक प्रतिज्ञा था। उसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि रोज़गार राज्य की दया पर निर्भर सुविधा नहीं, बल्कि नागरिक का कानूनी अधिकार है। सौ दिन के मज़दूरी-रोज़गार की गारंटी, मांग-आधारित व्यवस्था और काम न मिलने पर बेरोज़गारी भत्ते की वैधानिक अवधारणा—इन सबने मिलकर मनरेगा को गरीब के लिए संविधान की जीवंत व्याख्या बना दिया। गाँव का मज़दूर पहली बार यह कह सका कि “मुझे काम चाहिए” और राज्य को जवाब देना पड़ा।

इस अधिकार-आधारित दृष्टि का महत्व केवल आय-समर्थन तक सीमित नहीं था। मनरेगा ने ग्रामीण लोकतंत्र को भी सुदृढ़ किया। ग्राम सभा की भूमिका, सामाजिक अंकेक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही ने यह सुनिश्चित किया कि विकास का निर्णय काग़ज़ों में नहीं, गाँव की चौपालों पर हो। यही कारण है कि तमाम कमियों—वेतन में देरी, प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार—के बावजूद मनरेगा गरीब के लिए एक भरोसे का नाम बन सका।

अब जी-राम-जी को इसी विरासत की अगली कड़ी बताया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि भारत अब केवल राहत-आधारित नीतियों से आगे बढ़ना चाहता है। रोज़गार को दीर्घकालिक आजीविका, टिकाऊ अवसंरचना, जल-सुरक्षा और जलवायु-अनुकूल विकास से जोड़ा जाना चाहिए। इसी सोच के तहत रोज़गार-दिवस बढ़ाकर 125 करने, विकसित ग्राम पंचायत योजनाएँ बनाने और राष्ट्रीय अवसंरचना योजनाओं से अभिसरण की बात कही जा रही है। पहली नज़र में यह सब प्रगतिशील और दूरदर्शी लगता है।

पर यहीं से कल्याणकारी राज्य की बदलती परिभाषा पर बहस शुरू होती है। मनरेगा का केंद्र बिंदु नागरिक का अधिकार था; जी-राम-जी का केंद्र बिंदु प्रशासनिक मिशन प्रतीत होता है। मनरेगा में रोज़गार साध्य था; जी-राम-जी में वह साधन बनता दिख रहा है। यह बदलाव अपने-आप में गलत नहीं, लेकिन इसके परिणाम गहरे हैं। जब रोज़गार अधिकार से मिशन बनता है, तो जवाबदेही की प्रकृति बदल जाती है। अधिकार असफल होने पर सवाल पूछता है; मिशन असफल होने पर लक्ष्य और रणनीति बदल देता है।

एक और महत्वपूर्ण अंतर नियोजन की दिशा में दिखाई देता है। मनरेगा का ढाँचा नीचे से ऊपर की ओर था—ग्राम सभा तय करती थी कि गाँव को क्या चाहिए। जी-राम-जी में नियोजन अधिक संरचित, श्रेणीबद्ध और तकनीक-आधारित बताया जा रहा है। विकसित ग्राम पंचायत योजनाएँ, पंचायतों का वर्गीकरण और केंद्रीय योजनाओं से अभिसरण—ये सब दक्षता बढ़ा सकते हैं, पर यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इससे स्थानीय आवाज़ें दब न जाएँ। यदि ग्राम सभा की भूमिका औपचारिकता बनकर रह गई, तो ग्रामीण लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी।

तकनीक के प्रयोग को लेकर भी यही दुविधा है। मनरेगा ने पारदर्शिता के लिए सामाजिक अंकेक्षण और सार्वजनिक सुनवाई को चुना। जी-राम-जी में बायोमेट्रिक उपस्थिति, जियो-टैगिंग, डिजिटल डैशबोर्ड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी पर ज़ोर है। तकनीक भ्रष्टाचार रोकने में सहायक हो सकती है, लेकिन क्या यह भी उतना ही सच नहीं कि ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्सा आज भी डिजिटल रूप से वंचित है? जब अंगुलियों के निशान नहीं मिलते, नेटवर्क नहीं चलता या पोर्टल जवाब नहीं देता, तब अधिकार तकनीक के सामने हार जाता है। कल्याणकारी राज्य की परिभाषा में यह प्रश्न अनिवार्य है कि तकनीक सेवा का साधन बने, कहीं बाधा न बन जाए।

सबसे गंभीर प्रश्न संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा है। मनरेगा ने नीति-निदेशक तत्वों को विधिक अधिकार में बदला। यह उस कल्याणकारी राज्य की कल्पना थी, जहाँ राज्य अपने सबसे कमजोर नागरिक के सामने जवाबदेह होता है। जी-राम-जी यदि मिशन-आधारित प्रशासन में बदलता है, तो कहीं यह जवाबदेही केवल प्रशासनिक रिपोर्टिंग तक सीमित न रह जाए। अधिकार और मिशन के बीच यही मूल टकराव है—अधिकार नागरिक को शक्ति देता है, मिशन नागरिक को लाभार्थी बनाता है।

यह भी सच है कि मनरेगा की कमियाँ वास्तविक थीं। वेतन-विलंब, धन-प्रवाह की समस्याएँ और प्रशासनिक अक्षमता ने कई बार इसके उद्देश्य को कमजोर किया। लेकिन इन कमियों का समाधान अधिकार को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे और प्रभावी बनाना होना चाहिए था। जी-राम-जी तब सार्थक होगा, जब वह मनरेगा की कमियों को दूर करते हुए उसकी आत्मा को बचाए रखे।

कल्याणकारी राज्य का अर्थ यह नहीं कि विकास न हो; इसका अर्थ यह है कि विकास की दौड़ में कोई पीछे न छूटे। अवसंरचना आवश्यक है, पर उससे पहले यह भरोसा आवश्यक है कि संकट के समय राज्य नागरिक के साथ खड़ा रहेगा। मनरेगा ने यही भरोसा दिया था—एक न्यूनतम सुरक्षा-जाल, जिसके बिना विकास का सपना खोखला हो जाता है।

इसलिए मनरेगा और जी-राम-जी को प्रतिद्वंद्वी योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक निरंतरता के रूप में देखा जाना चाहिए—जहाँ अधिकार-आधारित कल्याण और विकास-उन्मुख मिशन एक-दूसरे के पूरक हों। जी-राम-जी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या वह रोज़गार को प्रशासनिक लक्ष्य के बजाय नागरिक के अधिकार के रूप में देखता है; क्या वह ग्राम सभा को डैशबोर्ड के शोर में खोने नहीं देता; और क्या वह तकनीक को साधन बनाता है, शर्त नहीं।

यदि भविष्य में रोज़गार ‘मांग’ पर नहीं, ‘योजना’ पर निर्भर होगा; यदि गरीब को काम न मिलने पर अदालत नहीं, बल्कि पोर्टल के चक्कर लगाने पड़ेंगे; और यदि ग्राम सभा की आवाज़ केंद्रीय लक्ष्यों में दब जाएगी—तो यह बदलाव कल्याणकारी राज्य की परिभाषा को संकुचित कर देगा।

सच्चा विकसित भारत वही होगा, जहाँ विकास की ऊँची इमारतें सामाजिक सुरक्षा की मज़बूत नींव पर खड़ी हों। मनरेगा ने उस नींव की ईंटें रखी थीं। जी-राम-जी को यह तय करना होगा कि वह उस नींव पर इमारत खड़ी करेगा या उसे बदलने की जल्दबाज़ी में कमज़ोर कर देगा।

डॉ० रमेश कुमार भारती
असिस्टेंट प्रोफेसर
विधि विभाग, सी एम पी डिग्री कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज।

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