जीवन एक टेस्ट है, खुशियां एक रेस्ट है, ज्यादा सोचना वेस्ट है, क्योंकि हम खुद ही इस संसार में गेस्ट हैं- पूज्य सदगुरु स्वामी कृष्णानंद

माघ मेला क्षेत्र के सेक्टर नंबर–2 में आयोजित सद्विप्र समाज सेवा शिविर में आज पूज्य सद्गुरुदेव स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायी आशीर्वचनों के माध्यम से खुश रहने की कला तथा दरिद्रता से मुक्ति के आध्यात्मिक व व्यावहारिक सूत्र श्रद्धालुओं को प्रदान किए। प्रवचन स्थल पर हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालु उनके विचारों को एकाग्रता से आत्मसात करते दिखाई दिए।पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रवचन की शुरुआत करते हुए कहा कि –
“जीवन एक टेस्ट है और खुशियां उसका बेस्ट परिणाम हैं।”
उन्होंने बताया कि जीवन की सही शुरुआत प्रतिदिन सुबह के सकारात्मक निर्णय से होती है। यदि मनुष्य यह निश्चय कर ले कि आज का दिन प्रसन्नता के साथ बिताना है, तो परिस्थितियां स्वतः अनुकूल होने लगती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमें अपने मन का रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथ में नहीं देना चाहिए।गुरुदेव ने व्यवहारिक जीवन की सीख देते हुए कहा कि यदि कोई अपशब्द कहे या अपमान करे, तो प्रतिक्रिया देने के स्थान पर मौन और मुस्कान को अपनाना चाहिए। सदैव मुस्कराते रहने से न केवल मन हल्का रहता है, बल्कि चेहरे पर सकारात्मक आभा भी बनी रहती है। उन्होंने कहा कि दुख को पकड़कर रखने से जीवन का रस समाप्त हो जाता है, जबकि मुस्कान जीवन को संजीवनी प्रदान करती है।
पूज्य सद्गुरुदेव ने संगति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य को सदैव सफल और सकारात्मक व्यक्तियों के साथ रहना चाहिए। नकारात्मक सोच और भाग्यहीनता की संगति से स्वयं का भी पतन हो सकता है। उन्होंने बताया कि लक्ष्मी की एक बहन दरिद्रता भी है, इसलिए जीवन में विवेक और आचरण का संतुलन आवश्यक है।धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए गुरुदेव ने बताया कि शनिवार को पीपल वृक्ष को प्रणाम करने से दरिद्रता और दुखों से मुक्ति मिलती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि केले का वृक्ष घर में नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इससे आर्थिक बाधाएं उत्पन्न होती हैं। इस विषय पर आचार्य जनेश्वर स्वामी एवं आचार्य कुणाल स्वामी ने भी अपने विचार रखते हुए शास्त्रीय एवं परंपरागत संदर्भ प्रस्तुत किए।पूज्य गुरुदेव ने भाषा और विचारों की शक्ति को रेखांकित करते हुए कहा कि पहले लोग एक-दूसरे से पूछते थे—“आप कैसे हैं?” और उत्तर मिलता था—“आपकी कृपा है, गुरु की कृपा है।” इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता था। यदि हम बार-बार दुख की बात करेंगे तो दुख ही आकर्षित होगा, क्योंकि मंगल और अमंगल का निर्माण हमारे विचारों से होता है।
ध्यान की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए गुरुदेव ने बताया कि ध्यान करते समय विचारों को क्रमवार नंबरिंग के साथ देखें। ऐसा करने से एक सप्ताह के भीतर साधक गहरे ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर सकता है। उन्होंने कहा कि द्वंद्व ही दुख का मूल कारण है। जो मिला है उसे स्वीकार कर परमात्मा को धन्यवाद देने से परिस्थितियां स्वतः बदलने लगती हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि एक्शन का रिएक्शन नहीं करना चाहिए। नकारात्मकता को अस्वीकार करने के स्थान पर सकारात्मक सोच अपनानी चाहिए, क्योंकि दुख का विरोध करने से वह सौ गुना बढ़ जाता है। सुख और दुख के दर्शन को उन्होंने सुखदेव मुनि के प्रसंग से जोड़ते हुए सहज रूप में समझाया।इस अवसर पर वरिष्ठ सदस्य लोक सेवा आयोग डॉ. कल्पराज सिंह, माननीय न्यायमूर्ति उच्च न्यायालय इलाहाबाद, गुरुदेव प्रतिनिधि आचार्य कुणाल स्वामी, आचार्य जनेश्वर स्वामी, वीरभद्र प्रताप , रामू बाबा सहित अनेक संत-महात्मा एवं गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। हजारों श्रद्धालुओं ने प्रवचन को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने पूज्य सद्गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा कि यह प्रवचन केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि जीवन को सरल, सुखी और संतुलित बनाने का मार्गदर्शन है।

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