आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का आज (१९ मई) निधन

प्रयागराज। उन दिनो इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हिन्दी-विभाग सारस्वत सम्पदा से परिपूर्ण था, तब अधिकतर अध्यापक अपने मूल कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान और योग्य होते थे। प्राय: हिन्दी-विभाग की ओर से आयोजित मौखिक परीक्षाओँ मे परीक्षक के रूप मे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को निमन्त्रित किया जाता था। उसी अवधि मे एक रोचक; किन्तु विचारणीय घटना घट गयी थी, जिसे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की पुण्य स्मृति मे ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से १९ मई को ‘सारस्वत सदन’, आलोपीबाग़, प्रयागराज मे एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन हुआ, जिसका प्रारम्भ आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय के एक रोचक संस्मरण से हुआ था। आचार्य पाण्डेय ने बताया– पं० हजारीप्रसाद द्विवेदी जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग मे एम०ए० की मौखिक परीक्षा ले रहे थे। उन दिनो एकांकी-सम्राट् कहलानेवाले डॉ० रामकुमार वर्मा विभागाध्यक्ष थे। एक छात्रा का नाम पुकारा गया था। वह रूपवती छात्रा परीक्षाकक्ष मे पहुँची। पण्डित द्विवेदी जी ने डॉ० वर्मा की ओर देखते हुए, उस छात्रा से प्रथम प्रश्न किया था,”एकांकी किसे कहते हैँ?” उस छात्रा ने बेहिचक उत्तर दिया था,”सर जी! एकांकी काल-सुन्दरी के सुन्दर कपोलोँ पर एक मधुर चुम्बन है।” उसका उत्तर सुनकर आचार्य जी का मस्तक झुक गया। उन्होँने उसी समय उस छात्रा से कहा, “अब तुम जाओ।” उस छात्रा के जाने के बाद पं० द्विवेदी जी ने दु:खी मन से डॉ० रामकुमार वर्मा कहा,”ये क्या तमाशा है? इससे एकांकी के किस अर्थ का बोध होता है?” इस पर डॉ० वर्मा ने संकोच और गर्व-मिश्रित शैली मे उत्तर दिया था, “पण्डित जी! यह मेरी ही परिभाषा है। जो मैने लिखवायी है, वही बच्ची ने बतायी है।” इस पर पण्डित जी ने अप्रसन्न होते हुए कहा, “मेरी चिन्ता का विषय यह नहीँ है कि किसकी परिभाषा है; चिन्ता का विषय है कि एक अंक का छोटा एकांकी काल-सुन्दरी के सुन्दर कपोलोँ पर अगर एक चुम्बन है तो सात अंकोँ का नाटक उस काल-सुन्दरी के साथ क्या होगा?” इस पर डॉ० वर्मा ने ग्लानि का अनुभव किया था।
सिकन्दराबाद से प्रो० यूनुस आलम ने बताया– एक आचार्य के रूप मे भारतीय रचनात्मक लेखन और समालोचना के क्षेत्र मे आचार्य द्विवेदी का योगदान असाधारण रहा है। उनकी रचनाओँ :– हिन्दी-साहित्य की भूमिका, हिन्दी का आदिकाल और मध्यकालीन धर्मसाधना ने हिन्दी-साहित्य और समालोचना को एक नया मोड़ दिया, जिसे आज हिन्दी-साहित्य के अवलोकन का आधारग्रन्थ माना जाता है।
सोलन से प्रो० विद्योत्तमा प्रधान ने बताया– आचार्य द्विवेदी कई भाषाओँ के पण्डित थे, जिनमे संस्कृत, पालि और प्राकृत के अतिरिक्त अपभ्रंश हिन्दी, गुजराती और बांग्ला-भाषाएँ शामिल थीँ। उत्साही पाठक और विद्वान् होते हुए भी विद्वत्ता उनके व्यक्तित्व का सहज अंग बन गयी थी।
देवघर से प्रो० दमयन्ती शुक्ल ने कहा– आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी यद्यपि पण्डित थे तथापि पाण्डित्य के गुणावगुण से परिचित भी थे; वे कहते थे :– ”पण्डिताई एक बोझ है; जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है तब वह बोझ नहीँ रहती।”
इनके अतिरिक्त प्रयागराज से डॉ० रचित यादव, मऊ से शशांक ओझा, नोएडा से डॉ० रंजीता आर्या, वाराणसी से डॉ० विनय उपाध्याय, शहडोल से डॉ० अमिता श्रीवास्तव इत्यादिक की सहभागिता रही।

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