गांव की चौपालों में कजरी गीतों का रागरंग सहेजें लोक कलाकार
कभी तीन दशक पहले सावन और बरखा बहार में गांव-गांव की चौपालों और खेत सिवानों से उठने वाली कजरी की गूंज और बागों में पड़ने वाले झूलों का वह आलम अब धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। हमारी लोक संस्कृति और सामाजिक परंपरा के ताने-बाने से बुने कजरी गीतों की विविधता का वह लोकरंग आम आदमी के जीवन की आपाधापी में कहीं गुम सा हो रहा है। कजरी का वह लोक स्वरुप जहां एक ओर समुद्र रूपी जल कलश को कटि पर धारण कर इतराती बलखाती ,कारे कजरारे बादल रूपी केशगुच्छ फहराती प्रकृति रूपी अद्भुत सुंदरी के आकाश मण्डल में नृत्य करने और बूंद बूंद जल गिरने से संतृप्त होती धरती के आलोक से परिकल्पित हुआ वहीं स्त्री बिरह की अवधारणाओं को लेकर कजरी गीतों के विवध राग-रंग हमारी गीत परम्परा के भी संवाहक बने। ….हमइ ना सवनवा सोहाय हो, पिया परदेशवा में छाये…..पिया मेंहदी लियायदा मोती झील से,जाइके साईकील से ना….अबकी सावन में नइहरे ना जाय देबै,झुलुआ झुलाय देबै ना…… रुनझुन खोला हो केवड़िया,हम बीदेसवा जाबइ ना….और मिर्जापुर कइला गुलजार हो, कचौड़ी गली सून कइला बलमू,जैसे कई कजरी गीत इस मौसम में काफी प्रचलित हुए।
कजरी गीतों का जनक उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जनपद है और यहां के कजरी मेलों में प्रतिवर्ष जुटने वाले कलाकार भी कई वर्षों से अपनी इस परम्परा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। मिर्जापुरी,बनारसीचौलर,चौलरिया,ढुनमुनिया,बेंगा,घसिया,बलियाउटी,इलाहाबादी,रीवानी,लगवही,कटनी,एकलवरा,झुलनाही,शायरी,दुइकड़िया,पछुवाही,तिनपतिया समेत विभिन्न प्रकार की धुन,लय सृजित कजरी गीतों के सर्वाधिक रूप प्रचलित रहे। इन्हीं कजरी गीतों में हमारे समाज में प्रचलित रजऊ, बलमुआ, कोठरी, कोठा, अंटारी, तेल बुकनी, पिया करेजऊ,घूंघट, पनघट, पोखरी ताल, सासुर, नइहर, बदरा,बिजुरी, सेजिया, पिरितिया, कीचकांदौ, भउजी, देवर,घूंघुर कजरा, सेनुरा, दिलजनिया, कथरी,गगरी जैसे अनेकों देशज और गहबर शब्दरंग, हमारी परिपाटी, संस्कृति- संस्कार,आचार सोच, विचार, सामाजिक सम्बन्ध,परिहास, उल्लास, अनुहार और मनुहार के प्रतीक बनकर हमारी गीत परम्परा से समाज को तार-तार जोड़ते रहे। कहीं..पटरा बंद करा हो बनवारी, हम घरे मारी जाबइ ना या फिर लागल सावन कै महीनवा,आवा चली बाबा नगरिया ना,जैसे कजरी गीतों में देवी देवताओं से जुड़कर तो कहीं -पूरबू के देशवा से उड़लि बादरिया,बरसै लागी ना,मोरे अंगना अंटरिया बरसै लागी ना।और कइसे खेलइ जइबू सावन मा कजरिया,बदरिया घेरि आईं ननदी…जैसे कजरी गीतों में हम अपने घर आंगन,खेत सिवानों से जुड़कर अपनी गीत परम्परा को जीते रहे हैं।
हालांकि आज भी आकाशवाणी, दूरदर्शन सांस्कृतिक मंचों पर अपनी गीत विरासत को संजोए रखने हेतु बिविध माध्यमों और मीडिया द्वारा भी प्रयास किए जा रहे हैं।कई लोक कलाकारों ने भी प्रस्तुतियों द्वारा इसकी अलख जगाई है।किंतु जरूरत है कि रील से आगे बढ़कर रीयल में भी हम गा, बजाकर, बरखा बहार, सावन और कजरी जैसे मौसमी गीतों के अतीत की उस परम्परा को घर घर,गांव-गांव,शहर, नगर तक सहेजे रखें।