जयंती पर विशेष “भारत के जिल्दसाज”

डॉ. विवेकानंद उपाध्याय
वरिष्ठ स्तंभकार, (देवरिया)

इतिहास में कुछ व्यक्तित्व तिथि नहीं, दृष्टि बन जाते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल ऐसे ही दृष्टि-पुरुष हैं। उन्हें केवल स्वतंत्रता सेनानी कहना, सागर को केवल पानी कहना है। वे भारत नामक महाग्रंथ के जिल्दसाज हैं, जिसने बिखरे पन्नों को एक सूत्र में पिरोकर ऐसा मजबूत ग्रंथ बनाया, जिसके पन्ने आज भी फटते नहीं हैं।

31 अक्टूबर, 1875 को नडियाद में जन्मा वह बालक भारत की एकता का पर्याय बनेगा, यह नियति ने तय कर रखा था। साहित्यिक रूपक में भारत की स्वतंत्रता एक महाकाव्य था। गांधी इसके ऋषि थे, जिन्होंने सत्य-अहिंसा का मंत्र दिया। नेहरू इसके स्वप्नद्रष्टा थे, जिन्होंने भविष्य का नक्शा खींचा। आजाद इसके स्वर थे, जिन्होंने गंगा-जमुनी तहजीब गाई। पर पटेल इसके सूत्रधार थे, जिन्होंने इस महाकाव्य को बिखरने से बचाया।

1947 का भारत अधूरी पांडुलिपि जैसा था। अंग्रेज जाते-जाते हमें 562 से अधिक रियासतों की भूल-भुलैया सौंप गए थे। यह केवल संख्या नहीं, भारत की आत्मा पर लगे टुकड़ों का प्रश्नचिह्न था। हर रियासत खुद को पूर्ण वाक्य मान रही थी। कोई स्वतंत्र रहने की बात कर रहा था, कोई पाकिस्तान जाने की। भारत वाक्य नहीं, शब्दों का अस्त-व्यस्त ढेर लग रहा था।

उस घड़ी में पटेल ने जिल्दसाज की भूमिका निभाई। जिल्दसाज के पास न नया कागज होता है, न नई स्याही, उसके पास होता है केवल सुई-धागा, गोंद और हुनर। पटेल के पास भी न सेना थी, न ज्यादा समय। उनके पास थे सचिव वी. पी. मेनन, लौह इच्छाशक्ति और जोड़ने का हुनर। उन्होंने बिखरे शब्दों को जोड़कर ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ नामक संप्रभु वाक्य रचा।

पटेल ने चार सूत्र अपनाए। कुछ रियासतों को पड़ोसी प्रांतों में मिलाया, कुछ को केंद्र के नियंत्रण में रखा, कुछ को मिलाकर सौराष्ट्र और मध्य भारत जैसे संघ बनाए, और मैसूर जैसी बड़ी रियासत को अलग इकाई रखा। प्रिवी पर्स, निजी संपत्ति और राजप्रमुख के सम्मान ने राजाओं को भरोसा दिया। यह विश्वास की जिल्दसाजी थी, बल की नहीं। जहाँ सुई से काम नहीं चला, वहाँ सख्ती करनी पड़ी। हैदराबाद, जूनागढ़ जैसी समस्याएं कठिन विराम-चिह्न थीं, जिन्हें पटेल ने संकल्प से सुलझाया।

उन्हें ‘लौह पुरुष’ कहना जीवंत रूपक है। लोहे से हल बनता है जो बंजर धरती चीरकर अन्न उगाता है, और उसी लोहे से ढाल भी बनती है जो राष्ट्र की रक्षा करती है। पटेल ऐसे ही थे – बाहर से वज्र-सा कठोर, भीतर से किसान की मिट्टी-सा कोमल। बारडोली में जब उन्होंने किसानों को विश्वास दिलाया कि साधारण किसान भी ‘सरदार’ बन सकता है, तब वे हल बन गए। और जब निजाम की रजाकार सेना अत्याचार कर रही थी, तब वही लोहा ढाल बन गया। 13 से 17 सितंबर, 1948 तक चला ‘ऑपरेशन पोलो’ महज 108 घंटे में खत्म हुआ। यह सैन्य कार्रवाई नहीं, मानवीय करुणा का संपादन था।

पटेल मितभाषी लेखक जैसे थे। कम बोलते थे, कर्म ही साहित्य था। उन्होंने सिविल सेवा को भारत का ‘स्टील फ्रेम’ कहकर जो प्रशासनिक एकता दी, वह आज भी लोकतंत्र की रीढ़ है।

आज नर्मदा किनारे खड़ी ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ केवल प्रतिमा नहीं, विराम-चिह्न है। वह 182 मीटर ऊंची खड़ी होकर पूछती है – क्या तुम आज भी उस एकता के लायक हो, जिसके लिए उस जिल्दसाज ने टुकड़ों को जोड़कर एक भारत बनाया था? आज जब विचारों, जातियों, भाषाओं और सोशल मीडिया की नई-नई रियासतें बन रही हैं, तब यह मंत्र और प्रासंगिक हो जाता है।

एकता कोई सरकारी फाइल नहीं जिस पर एक बार हस्ताक्षर हो जाए। एकता नदी है, जिसे रोज बहाना पड़ता है। एकता कविता है, जिसे हर पीढ़ी को फिर लिखना पड़ता है। सरदार ने पहली पंक्ति दी – “हम सब भारतीय हैं।” दूसरी पंक्ति हमें लिखनी है। यही उस जिल्दसाज को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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