प्रयागराज।
माघ मेला प्रयागराज में पूज्य गुरुदेव स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने गुरु-भक्ति के महत्व पर अपने ओजस्वी आशीर्वचनों में कहा कि “जिंदगी के रथ में बहुत सी लगामें होती हैं। अपनों के अपनों पर इल्ज़ाम और शिकायत का यह दौर जीवन को थका देता है। ऐसा लगता है कि उम्र कम है और इम्तिहान बहुत ज़्यादा।”
पूज्य गुरुदेव ने कहा कि जब मनुष्य जीवन की प्रत्येक परिस्थिति को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेता है, तभी जीवन संघर्ष से साधना में परिवर्तित हो जाता है। सुख-दुःख, लाभ-हानि और यश-अपयश—ये सभी परमात्मा द्वारा दिए गए साधना-पथ के सोपान हैं। शिकायत और प्रतिरोध मनुष्य को बाँधते हैं, जबकि सहज स्वीकार उसे आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाता है।अपने प्रवचन में उन्होंने श्रीमद्भागवत के महान वक्ता सुखदेव जी का उदाहरण देते हुए कहा कि जन्मजात सिद्ध होने पर भी गुरु के बिना कोई भवसागर पार नहीं कर सकता। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है—
“गुरु बिनु तरही न कोही, वीरंचि विष्णु शंकर सम होई।”यह प्रश्न योग्यता का नहीं, बल्कि अहंकार के त्याग और पूर्ण समर्पण का है।स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने भक्तमाल के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि देवी के अनन्य भक्त राजा शिफा को जब गुरु-दृष्टि प्राप्त हुई, तब उन्होंने जगद्गुरु स्वामी रामानंद जी से वैष्णव दीक्षा ग्रहण की। यह दीक्षा देवी-भक्ति का त्याग नहीं, बल्कि भक्ति की परिपक्वता और विवेक की प्राप्ति थी। गुरु का कार्य खंडन नहीं, बल्कि समन्वय है।पूज्य गुरुदेव ने कहा कि नकारात्मक चिंतन में ब्रह्मज्ञान नहीं उतरता और अस्थिर मन में ध्यान फलित नहीं होता। साधना में सही समय, सही स्थान और सही पात्रता का चयन केवल सद्गुरु ही कर सकते हैं।अपने उद्बोधन के समापन में उन्होंने कहा कि गुरु कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि चेतना हैं। गुरु वही शक्ति है जो अहंकार को तोड़कर आत्मा को परमात्मा से जोड़ देती है।जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं गुरु का प्राकट्य होता है।इस अवसर पर माननीय न्यायमूर्ति उच्च न्यायालय श्रीमती मंजू रानी चौहान, वरिष्ठ सदस्य लोक सेवा आयोग डॉ. कल्पराज सिंह, आचार्य कुणाल स्वामी, आचार्य जनेश्वर स्वामी एवं वीरभद्र प्रताप प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
गुरु-भक्ति से ही जीवन को दिशा और मुक्ति का मार्ग मिलता है : स्वामी कृष्णानंद जी महाराज