मिट्टी से जुड़ी संस्कृति और आजीविका पर संकट- डॉ.मणि शंकर द्विवेदी

दम तोड़ती कुम्हारों की परम्परा

नैनी, प्रयागराज। हुडसा संस्था के सचिव एवं मोतीलाल नेहरू पी.जी. कॉलेज कौंधियारा के प्राचार्य डॉ.मणि शंकर द्विवेदी ने दम तोड़ती कुम्हारों की परंपरा के विषय पर यमुनापार में कुम्हार परिवार के बीच किए भ्रमण, हुड्सा संस्था द्वारा किए सर्वे के आधार पर जो बातें उभर कर आयी हैं उनके आधार पर डॉ द्विवेदी ने साक्षात्कार में बताया कि भारत की पहचान उसकी विविध संस्कृति, लोक परंपराओं और पारंपरिक व्यवसायों से रही है। इन्हीं में से एक है कुम्हारों द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाने की कला, जो सदियों से भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। कभी गाँवों की सुबह मिट्टी के घड़ों से ठंडा पानी पीने और शाम दीयों की रोशनी से जगमगाने के साथ शुरू होती थी। घर-घर में मटके, सुराही, कुल्हड़, दीये और अन्य मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता था। लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रही है। कुम्हार समुदाय की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही आजीविका आज गंभीर संकट का सामना कर रही है। आर्थिक दृष्टि से यह व्यवसाय अब पहले जैसा लाभकारी नहीं रहा। मिट्टी के बर्तन बनाने में अत्यधिक श्रम, समय और कौशल की आवश्यकता होती है, लेकिन उसके अनुरूप आय प्राप्त नहीं होती। अच्छी गुणवत्ता की मिट्टी जुटाने, उसे तैयार करने, बर्तन बनाने, सुखाने और पकाने की पूरी प्रक्रिया कठिन और खर्चीली है। करछना स्थित चाका गांव के छिहत्तर वर्षीय राम लाल प्रजापति 70 के दशक से इस पेशे में अपनी आजीविका चला रहे हैं, उनका मानना है कि मिट्टी के बर्तनों का बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल पाता जिसके कारण कुम्हार परिवार आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव नई पीढ़ी पर पड़ रहा है। आजकल के बच्चे इस परंपरागत कला के प्रति कोई रुचि नहीं ले रहे हैं। वहीं डांडी के नन्द किशोर ने इस आजीविका के सामने मिट्टी प्रबंधन को सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि मिट्टी के जुगाड़ में हम लोगों का बहुत समय और पूंजी खर्च हो जाती है, सरकार और समाज पूर्णतया उदासीन हैं। कुम्हार गेमराज ने कहा कि हम लोग आज भी गांवों के स्थानीय हाट-बाजारों तक ही सीमित हैं जबकि देश में बड़े – बड़े आधुनिक व्यापारिक नेटवर्क काम करने लगे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि प्लास्टिक से बने सामानों का बड़े पैमाने पर चलन ने हमारी परंपरा को जख्मी किया है।
डॉ मणि शंकर द्विवेदी ने कहा कि कौंधियारा के राम भरोसे ने विश्वास व्यक्त किया कि यदि विद्युत चालित चाक, उपयुक्त मिट्टी, बर्तन पकाने के लिए लोहे की भट्ठी और आधुनिक बाजारी व्यवस्था में हिस्सेदारी आदि मिल जाय तो हम सबके जीवन में न केवल क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा बल्कि पर्यावरण सन्तुलन में हमारी भी भूमिका गणनीय हो जाएगी। सच यह है कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से मिट्टी के उत्पाद आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। जब पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से जूझ रही है, तब मिट्टी के बर्तन पूरी तरह प्राकृतिक, जैविक और पर्यावरण- अनुकूल विकल्प प्रस्तुत करते हैं। कुम्हारों की समस्या केवल एक समुदाय की समस्या नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का प्रश्न भी है। समय की मांग है कि सरकार, कॉर्पोरेट क्षेत्र, स्वयंसेवी संस्थाएँ और समाज मिलकर इस दिशा में ठोस प्रयास करें। कुम्हारों को आधुनिक डिज़ाइन, तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, आसान ऋण, डिजिटल विपणन और स्थायी बाजार उपलब्ध कराए जाएँ। कुम्हारों के चाक की गति केवल मिट्टी को आकार नहीं देती, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भरता को भी आकार देती है। आवश्यकता इस बात की है कि हम समय रहते इस विरासत को बचाने के लिए आगे आएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी मिट्टी की उस सोंधी खुशबू और उससे जुड़ी भारतीयता को महसूस कर सकें।

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