डॉ. विवेकानंद उपाध्याय*
*स्तंभकार*
हर साल 9 सितंबर आते ही हिंदी साहित्य अपने पितामह के दरवाजे पर सिर झुकाता है। काशी की एक तंग गली, एक हवेली और उस हवेली में जन्मा एक बालक — जिसने कुल 34 साल और 4 महीने के जीवन में वह कर दिखाया, जिसे करने में सदियों लग जाती हैं। वह बालक था हरिश्चंद्र, जिसे दुनिया ने बाद में ‘भारतेन्दु’ कहा, यानी भारत का चंद्रमा।
1850 का भारत, गुलामी का अंधेरा, अंग्रेजी हुकूमत की धाक, और ऐसे में एक किशोर का यह संकल्प लेना कि ‘मुझे अपनी भाषा की सेवा करनी है’, अपने आप में एक क्रांति थी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और संपन्न अग्रवाल परिवार में हुआ था। उनके पिता बाबू गोपाल चंद्र स्वयं ब्रजभाषा के सिद्ध कवि थे और ‘गिरधर दास’ के उपनाम से लिखते थे। घर में कविता, साहित्य और संगीत की गंगा बहती थी। कहते हैं इसी वातावरण का असर था कि पाँच साल की उम्र में ही बालक हरिश्चंद्र ने अपना पहला दोहा रच दिया —
लै ब्यौड़ा ठाड़े भए, श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सैन्य को, हनन लगे भगवान्।।
यह दोहा सुनकर पिता ने कहा था कि यह बालक मेरा नाम जरूर रोशन करेगा। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। पाँच साल की उम्र में माँ का आँचल छूटा और दस साल के होते-होते पिता का साया भी उठ गया। धन था, वैभव था, पर सिर पर हाथ रखने वाला कोई नहीं। शायद इसी अकेलेपन और यथार्थ के इतने जल्दी सामने आ जाने ने उन्हें समय से पहले परिपक्व बना दिया।
भारतेन्दु ने जिस दौर में लिखना शुरू किया, वह हिंदी के लिए संक्रमण का दौर था। दरबारों में ब्रजभाषा, कचहरियों में फारसी और हुकूमत की जुबान अंग्रेजी। आम हिंदुस्तानी की अपनी कोई साहित्यिक भाषा ही नहीं बची थी। भारतेन्दु ने इस खालीपन को पहचाना। सोलह साल की उम्र में उन्होंने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया — हिंदी की सेवा। और फिर उन्होंने जो किया, वह इतिहास बन गया।
उनका वह एक दोहा, जो आज हर हिंदी दिवस पर गूँजता है, केवल दो पंक्तियाँ नहीं, पूरे राष्ट्र के नवजागरण का घोषणापत्र है —
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
वे जानते थे कि बिना अपनी भाषा के कोई समाज आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, अस्मिता है।
भारतेन्दु को केवल कवि कहना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना है। वे एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे। वे कवि थे, नाटककार थे, निबंधकार थे, व्यंग्यकार थे, पत्रकार थे, समाज सुधारक थे और सबसे बढ़कर एक रंगकर्मी थे।
पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने अठारह साल की अल्पायु में 1867 में ‘कविवचनसुधा’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका उस समय के बड़े से बड़े विद्वानों का मंच बन गई। इसके बाद ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’, ‘हरिश्चंद्र पत्रिका’ और स्त्री शिक्षा के लिए ‘बाला बोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन कर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को आधुनिक रूप दिया। उन्होंने बताया कि पत्रकारिता केवल खबर देना नहीं, बल्कि समाज को जगाना भी है।
हिंदी नाटक तो वस्तुतः उन्हीं से शुरू होता है। इससे पहले नाटक लिखे तो जाते थे, पर खड़ी बोली में मौलिक और मंचीय नाटक की परंपरा भारतेन्दु ने ही डाली। बांग्ला नाटक ‘विद्यासुंदर’ के अनुवाद से उनकी नाट्य-यात्रा शुरू हुई और फिर ‘अंधेर नगरी’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘सत्य हरिश्चंद्र’, ‘नीलदेवी’ जैसे नाटकों ने जनता को झकझोर दिया। ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा’ आज डेढ़ सौ साल बाद भी उतना ही सच लगता है, जितना तब लगता था। ‘भारत दुर्दशा’ में उन्होंने अंग्रेजी राज में भारत की दुर्दशा को प्रतीकात्मक रूप में मंच पर उतार कर लोगों की आँखें खोल दीं।
उनकी प्रतिभा का विस्तार देखिए कि वे संस्कृत, मराठी, बांग्ला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी जैसी कई भाषाओं के जानकार थे। उन्होंने ये सभी भाषाएँ अपने परिश्रम से सीखी थीं। तेज स्मरण शक्ति और स्वतंत्र सोच ने उन्हें काशी का सबसे लोकप्रिय व्यक्ति बना दिया था। इसी लोकप्रियता के कारण 1880 में काशी के विद्वानों ने उन्हें ‘भारतेन्दु’ की उपाधि से सम्मानित किया।
भारतेन्दु अमीर थे, बेहद अमीर। पर उन्होंने अपना सारा धन साहित्य, मित्रों और गरीबों पर लुटा दिया। काशी में किस्से मशहूर हैं कि जाड़े की रात में उन्होंने अपना कीमती दुशाला किसी भिखारी को ओढ़ा दिया और खुद घर चले आए। वे रईस नहीं, फकीर दिल इंसान थे। उन्होंने गरीबी, गुलामी और शोषण के खिलाफ अपनी कलम को हथियार बनाया।
इसी कारण हिंदी साहित्य के इतिहास में 1857 से 1900 तक के समय को ‘भारतेन्दु युग’ कहा जाता है। वे आधुनिक हिंदी के पितामह कहलाते हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को नया संस्कार दिया, उसे दरबारी भाषा से निकालकर जनता की भाषा बनाया।
6 जनवरी 1885 को, केवल 34 वर्ष की आयु में, इस चंद्रमा ने इस संसार से विदा ले ली। मृत्यु का कारण क्षय रोग बताया जाता है, पर सच तो यह है कि उन्होंने अपने छोटे से जीवन में इतना जलाया कि दीया समय से पहले ही बुझ गया।
आज उनकी जयंती पर सवाल यह नहीं है कि हमने उन्हें कितना याद किया, सवाल यह है कि क्या हम उनके बताए रास्ते पर हैं? जब हम अपनी भाषा को हीन भावना से देखते हैं, जब हम ‘अंधेर नगरी’ को देखकर भी चुप रहते हैं, तो हमें फिर से भारतेन्दु को पढ़ने की जरूरत है।
भारतेन्दु मरे नहीं हैं। वे हर उस प्रेस में जीवित हैं जो सच छापती है, हर उस मंच पर जीवित हैं जहाँ ‘भारत दुर्दशा’ पर सवाल उठता है, और हर उस छात्र की जीभ पर जीवित हैं जो गर्व से कहता है — निज भाषा उन्नति अहै।