भारत बन गया दुनिया का डॉक्टर

 यह कहना बिल्कुल अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत आज ‘दुनिया के डॉक्टर’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। अपनी उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं, किफ़ायती दवाओं और वैश्विक संकटों में अपनी अग्रणी भूमिका के कारण भारत ने मानवता की सेवा में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।वैसे भी प्राचीन काल से ही भारत ‘आयुर्वेद’ और ‘सुश्रुत’ की विरासत के माध्यम से चिकित्सा जगत का मार्गदर्शक रहा है। लेकिन आधुनिक युग में, भारत ने तकनीकी प्रगति और दुनिया के स्वास्थ्य मानचित्र पर अपनी एक अनिवार्य जगह बना ली है। बीते कुछ दशकों में वैश्विक परिदृश्य पर भारत की…

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विमान हादसों में नेताओं की असमय विदाई

 डॉ. सत्यवान सौरभ भारत की राजनीतिक यात्रा बार-बार आकाशी हादसों की भेंट चढ़ती रही है। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार की बारामती विमान दुर्घटना ने एक बार फिर पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। पांच लोगों की मौत के साथ राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा हुआ, जिसकी भरपाई केवल संवेदनाओं से संभव नहीं। यह पहला मामला नहीं है—संजय गांधी (1980), माधवराव सिंधिया (2001), वाई.एस. राजशेखर रेड्डी (2009) जैसे उदाहरण बताते हैं कि उच्च पदस्थ नेताओं की अकाल मृत्यु बार-बार एक ही प्रश्न खड़ा करती है: क्या विमान हादसे महज़…

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कन्यादान नहीं, सम्मान चाहिए

 डॉ. प्रियंका सौरभ आज विश्व बालिका दिवस मनाया जा रहा है। देश और दुनिया में इस अवसर पर अनेक कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ और प्रतीकात्मक आयोजन हो रहे हैं। मंचों से बालिकाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तीकरण की बातें कही जा रही हैं। लेकिन यह प्रश्न बार-बार सामने आता है कि क्या किसी एक दिवस का आयोजन वास्तव में उस गहरी सामाजिक समस्या का समाधान कर सकता है, जो पीढ़ियों से बालिकाओं के जीवन को प्रभावित करती आ रही है। सम्मान किसी कैलेंडर की तारीख से तय नहीं होता, बल्कि वह समाज…

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डॉ. प्रियंका सौरभ की बाल काव्य पुस्तकें:

डॉ. प्रियंका सौरभ हरियाणा शिक्षा विभाग में राजनीति विज्ञान की पीजीटी लेक्चरर हैं तथा राजनीति विज्ञान में पीएचडी धारक। उनकी बाल कविता पुस्तकें “बच्चों की दुनिया और परियों से संवाद” बच्चों के लिए अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक हैं। ये काव्य संग्रह बाल मन की मासूमियत को परियों के जादुई संवादों से सजाते हैं, नैतिक शिक्षा प्रदान करते हुए कल्पना की उड़ान भराते हैं। लेखिका का संक्षिप्त परिचय डॉ. प्रियंका सौरभ हरियाणा के सरकारी स्कूलों में छात्रों को राजनीतिक सिद्धांत, लोकतंत्र और शासन व्यवस्था सिखाती हैं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें बाल…

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77वां गणतंत्र दिवस 2026:वंदे मातरम के 150 वर्ष,

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत एक बार फिर इतिहास के ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है,जहां परंपरा और भविष्य एक-दूसरे से हाथ मिलाते दिखाई दे रहे हैं।26 जनवरी 2026 को भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है और इस बार यह समारोह केवल एक संवैधानिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना,सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक कूटनीति का भव्य प्रदर्शन बनने जा रहा है। कर्तव्य पथ पर होने वाला यह आयोजन भारत की उस यात्रा का प्रतीक है,जिसमें वह औपनिवेशिक विरासत से निकलकर आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी…

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गणतंत्र के 77 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य का संकल्प

– डॉ. सत्यवान सौरभ भारत का गणतंत्र आज 77 वर्ष का हो चुका है। 26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान ने एक नई भारत की नींव रखी, जो स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों से प्रेरित थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हमने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की—साहित्य, खेल, कृषि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर आर्थिक-सैन्य क्षमता तक। विविध संस्कृति को मजबूत करते हुए राष्ट्र ने वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाई। चंद्रयान मिशनों से अंतरिक्ष विज्ञान में अग्रणी बने, यूपीआई जैसी डिजिटल क्रांति ने भुगतान व्यवस्था बदल दी, जबकि ओलंपिक-एशियाड में पदकों…

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माँ-बाप की नीयत, परवरिश और टूटते घर

– डॉ. प्रियंका सौरभ भारतीय समाज में माता-पिता को सर्वोच्च नैतिक स्थान प्राप्त है। उन्हें त्याग, तपस्या और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक माना जाता है। बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि माँ-बाप कभी गलत नहीं हो सकते। उनकी हर बात आदेश है, हर निर्णय अंतिम सत्य। लेकिन बदलते सामाजिक परिदृश्य में यह धारणा अब कई सवालों के घेरे में है। आज जब पारिवारिक विघटन, तलाक, अलगाव और घरेलू तनाव की घटनाएँ बढ़ रही हैं, तब यह जरूरी हो गया है कि हम ईमानदारी से यह स्वीकार करें—माँ-बाप भी…

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भारत का राष्ट्र-निर्माण विमर्श बनाम सामाजिक यथार्थ:

भारत में सांप्रदायिक हिंसा 2025:- गिरावट के आंकड़े,गहरी होती सामाजिक दरारें और लोकतंत्र के सामने नई चुनौती हिंसा का स्वरूप बदलना,अधिक विकेंद्रित, अनियोजित, व्यक्तिगत या भीड़-आधारित होना,समाज के भीतर गहरे अविश्वास और नफरत की निरंतर मौजूदगी को दर्शाता है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – 14 जनवरी 2026 को दिल्ली में आयोजित पोंगल महोत्सव के मंच से भारतीय प्रधानमंत्री का यह कथन कि राष्ट्र निर्माण में किसानों का महत्वपूर्ण योगदान है,केवल एकसांस्कृतिक या औपचारिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना की ओर…

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यौन शोषण के अड्डे बनते स्कूल-कॉलेज

शिक्षा और सुरक्षा के बीच फँसी छात्राएँ: यौन शोषण के अड्डे बनते स्कूल-कॉलेज – डॉ. प्रियंका सौरभ शिक्षा को भारतीय समाज में ‘मंदिर’ कहा जाता रहा है—एक ऐसा पवित्र स्थान जहाँ ज्ञान, संस्कार और भविष्य का निर्माण होता है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह से शिक्षण संस्थानों से यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण, डर और असुरक्षा की खबरें सामने आ रही हैं, उसने इस धारणा को गहरी चोट पहुँचाई है। सवाल यह नहीं है कि घटनाएँ हो रही हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हमारे स्कूल, कॉलेज…

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नार्को-टेरर-मिशन ड्रग फ्री इंडिया @2029:नशे के खिलाफ़ भारत की निर्णायक लड़ाई

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत ने पिछले एक दशक में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर जिस प्रकार का निर्णायक बदलाव देखा है, वह न केवल राष्ट्रीय राजनीति बल्कि अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समुदाय के लिए भी अध्ययन का विषय बन गया है। नक्सलवाद, जिसे लंबे समय तक भारत की सबसे गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती माना गया, उसके विरुद्ध 31 मार्च 2026 तक समाप्ति का लक्ष्य तय कर जिस तरह ठोस, बहु-स्तरीय और निरंतर अभियान चलाया गया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत समन्वय…

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