‘सर्जनपीठ’ का अन्तरराष्ट्रीय आन्तर्जालिक आयोजन
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प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे हिन्दी-दिवस के अवसर पर ‘सारस्वत सदन-सभागार’, अलोपीबाग़, प्रयागराज से एक अन्तरराष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया, जिसमे जर्मनी, फ्रांस तथा भारत के साहित्यकारोँ, शिक्षक-शिक्षिकाओँ, कवि-कवयित्रियोँ आदिक की सहभागिता रही।
बर्लिन इण्टरनेशनल युनिवर्सिटी ऑव़ अप्लाइड साइंसेस, जर्मनी मे एसोसिएट हिन्दी चैसिले कारलोटे ने कहा– हिन्दी को इण्डिया का नेशनल लैंग्वेज़ बनाने मे पोलिटिकल प्रॉब्लेम बहुत है; फिर भी हमे इसकी चिन्ता नहीँ करनी है। हम सबको युनाइटेड होकर इसके लिए काम करना होगा।
पी० सी० एल० रिसर्च युनिवर्सिटी, पेरिस (फ्रांस) की हिन्दी-सलाहकार प्रो० गायत्री रंगास्वामी ने कहा– पोलिटिकल डिज़ायर ख़त्म हो चुकी है। भारत के ही प्रबुद्ध लोग इस दिशा मे आगे बढ़ सकता है। हम भी हैँ; पर थोड़ा-थोड़ा। हम तो पेरिस मे रहकर जितनी पॉसिबैलिटि है, सबको करता है।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हिन्दीतर राज्योँ की जनता का हृदय जीतना होगा। इसके लिए प्रतिवर्ष अहिन्दीभाषाभाषी राज्योँ मे जाकर वहाँ की सभ्यता-संस्कृति को जोड़ते हुए, साहित्यिक और सामाजिक उत्थान के कार्य करने होँग। उन्हेँ हिन्दीभाषाभाषी राज्योँ मे निमन्त्रित कर, हिन्दीप्रधान ग्रनथोँ के हिन्दीतर भाषाओँ मे अनुवादिक कार्योँ मे नियोजित करना होगा।
नागरी प्रचारिणी सभा, देवरिया के वरिष्ठ उपाध्यक्ष इन्द्रकुमार दीक्षित ने कहा– सुदृढ़ तथा अखण्ड भारत की कल्पना राष्ट्रभाषा के बिना नहीँ की जा सकती । अब समय आ गया है कि राष्ट्र के सभी घटकोँ को भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ शिक्षा,
संस्कृति, विधि, व्यापार की राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति की क्षमता रखनेवाली भाषा हिन्दी देवनागरी लिपि के साथ राष्ट्रभाषा घोषित हो।
प्रयागराज से साहित्यमहामहोपाध्याय डॉ० सुरेन्द्रकुमार पाण्डेय ने कहा–
जब एक राष्ट्र एक चुनाव, एक राष्ट्र एक कानून की बात हो रही है तो एक राष्ट्र एक भाषा की भी बात होनी चाहिए। हिन्दी का संरक्षण, संवर्धन और उत्कर्ष हो , यह समय की मांग है। इससे राष्ट्रीय एकता भी अक्षुण्ण होगी।
सी०एम०पी० डिग्री कॉलेज, प्रयागराज की प्राध्यापक डॉ० सरोज सिंह ने कहा– सहजता, सुबोधता, सर्वग्राही, प्रयोजनीयता तथा व्यवहारिकता के कारण राज-भाषा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप मे स्थान मिलना चाहिए।
देवरिया से साहित्यकार प्रियंवदा पाण्डेय ने कहा– हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सबसे पहले सरकारोँ का जागरूक होना आवश्यक है।
तथा आम जनमानस का हिन्दी के प्रति संकीर्ण भाव का त्याग भी।