प्रतिष्ठित गीतकार पं० दयाशंकर पाण्डेय का निधन

गीत-परम्परा के समृद्ध स्तम्भ थे, पं० दयाशंकर पाण्डेय
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सुमधुर कण्ठ के धनी, देश के प्रख्यात गीतकार पं० दयाशंकर पाण्डेय का २० अक्तूबर को विजयदशमी के दिन उनके ‘सृजन-सदन’, १३४३, इन्द्रपुरी कॉलोनी, भरद्वाजपुरम्, प्रयागराज-स्थित निवास मे अपराह्ण पौने दो बजे देहावसान हो गया था। ८८ वर्षीय पं० दयाशंकर पाण्डेय की एक पुत्र, दो पुत्रियाँ तथा एक पौत्र और एक पौत्री तथा पुत्रवधू हैँ; पत्नी का पूर्व मे ही शरीरान्त हो चुका था। उनका अन्तिम संस्कार दाराग़ज घाट पर किया गया। मुखाग्नि एकमात्र पुत्र आलोककुमार पाण्डेय ने दी।
पं० दयाशंकर पाण्डेय के अत्यन्त शुभेच्छु व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया कि दयाशंकर जी पिछले एक सप्ताह से रोगग्रस्त हो चुके थे, जिसके कारण वे भोजन करने मे समर्थ नहीँ थे। उनका मस्तिष्क रुग्ण हो चुका था, जिसके कारण उन्हेँ गत १८ अक्तूबर को साकेत चिकित्सालय मे भरती कराया गया, जहाँ चिकित्सकोँ ने हाथ खड़े कर दिये, जिसके कारण उन्हेँ घर लाया गया और प्राणवायु उपकरण के सहारे रखा गया; परन्तु उनका निधन हो गया।
पं० दयाशंकर पाण्डेय का जन्म ७ अगस्त, १९३६ ई० को शुक्लपुर, मेजा, इलाहाबाद मे हुआ था। उन्होँने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी० ए०, एल-एल० बी० की उपाधियाँ अर्जित की थीँ। वे अगस्त, १९६७ ई० मे महालेखा-कार्यालय (उ० प्र०), इलाहाबाद से वरिष्ठ लेखाधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। वे कार्यालयीय पत्रिका ‘तरंग’ के सम्पादक भी थे। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओँ मे उनके गीत प्रकाशित होते थे तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित भी।
सुधियों की परतें, परछाइयाँ, प्रतीक्षा इत्यादिक उनकी काव्य-कृतियाँ चर्चा के केन्द्र मे बनी रहीँ। उनके सर्जनात्मक रचनाकर्म से प्रभावित होकर अनेक संस्थाओँ ने उनका सारस्वत सम्मान किया।
पं० दयाशंकर पाण्डेय की स्मृति मे ‘सर्जनपीठ’ की ओर से उनके क़रीबी सहयोगी और शाइर ‘तलब जौनपुरी’ की अध्यक्षता मे एक शोकसभा का आयोजन किया गया।
समाजशास्त्री एवं वैचारिकी संस्था के सचिव प्रो० रवि मिश्र ने कहा– पं० दयाशंकर पाण्डेय का व्यक्तित्व सौम्य, सरल तथा गम्भीर था। वे इलाहाबाद की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को जीते थे। नवोदित रचनाकारोँ का उत्साहवर्द्धन करते थे तथा स्पष्ट वक्ता थे।
संयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने उनके एक गीत की आरम्भिक पंक्तियाँ सुनायीँ :– “दुनिया बदल गयी है, चिन्तन बदल गया है। बदली हैँ मान्यताएँ, परिचय बदल गया है।” आचार्य ने आगे बताया कि उनकी काव्यगत शब्दशक्ति अतीव प्रभावकारी थी। वयोवृद्ध रहते हुए भी जब वे कवि-दरबार मे अपने गीतोँ को प्रस्तुत करते थे तब उन्हेँ किसी माइक्रोफ़ोन की आवश्यकता नहीँ पड़ती थी; क्योँकि उनकी वाणी की ओजस्विता हर श्रोता को मन्त्रमुग्ध कर देती थी। वे डॉ० मोहन अवस्थी की परम्परा के अनुगीतकार के रूप मे भी प्रसिद्ध थे।
गीतकार डॉ० वीरेन्द्रकुमार तिवारी ने बताया कि वे बहुत अच्छे गीतकार थे। वे मुक्तक भी लिखते थे; सबको साथ लेकर चलने मे विश्वास करते थे।
शाइर तलब जौनपुरी ने बताया– पं० दयाशंकर जी के साथ मेरे घनिष्ठ सम्बन्ध थे। वे बहुत ही सहज-सरल और खुले दिमाग़ के थे। उन्हें अच्छा-बुरा जो भी लगता था, बिना किसी भय के तुरन्त कह देते थे।
कवयित्री उर्वशी उपाध्याय ने कहा– वे गम्भीर स्वभाव के साहित्यकार थे। वे भारतीय संस्कृति की परम्परा के साथ गहराई से जुड़े हुए थे।
कथाकार शिवमूर्ति सिंह ने कहा– पाण्डेय जी जब तक लिखते रहे, उनकी जीवन्तता बनी रही।

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