आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पं० बालकृष्ण भट्ट को ‘हिन्दी का स्टील’ योँ ही नहीँ कहा था”– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयागराज। देश मे इलाहाबाद (वर्तमान मे प्रयागराज) को जो सर्वांगीण महत्त्व है, वह अन्य किसी स्थान को प्राप्त नहीँ है। इसका मुख्य कारण है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे उसका अप्रतिम नेतृत्व। अध्यात्म, दर्शन, कला-संस्कृति, समाज, साहित्य, इतिहास-पुरातत्त्व, विज्ञान, राजनीति इत्यादिक क्षेत्रोँ मे एक-से-बढ़कर विभूतियोँ ने देश और राष्ट्र को समृद्ध करने मे जो अपना योगदान अर्पित किया है, वह अद्वितीय रहा है। इलाहाबाद को ‘साहित्य की निधि’ माना गया है; क्योँकि वहाँ के स्वनामधन्य साहित्यकारोँ ने अपनी सारस्वत प्रातिभसामर्थ्य से साहित्यजगत् को कृतकृत्य किया है।
उसी शृंखला मे भारतेन्दु और द्विवेदीयुगीन सार्वकालिक निबन्धकार पं० बालकृष्ण भट्ट का कर्त्तृत्व प्रथम पंक्ति मे संलक्षित होता है।
‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से इलाहाबाद के मुहल्ले अहियापुर मे जन्म लेनेवाले हिन्दी-साहित्य और पत्रकारिता के शिखरस्थ सारस्वत हस्ताक्षर पं० बालकृष्ण भट्ट के निधन-दिनांक २० जुलाई को उनकी पुण्य स्मृति मे एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।
नागपुर (महाराष्ट्र) से साहित्यकार-समीक्षक डा० जयन्त परीक्षित ने बताया– मैंने अपने विद्यार्थी-जीवन मे अपने हिन्दीगद्य-पाठ्यक्रम के अन्तर्गत भट्ट साहिब के कई निबन्ध पढ़े थे, जिसमे उनके द्वारा किये गये शब्द चयन अत्यन्त प्रभावकारी होते थे, जिससे ज्ञात होता था कि भाषा के धरातल पर वे कितने समृद्ध साहित्यकार थे।
कटनी (मध्यप्रदेश) से कवयित्री और शाइरा डा० फ़रहा ख़ातून ने कहा– मै पं० बालकृष्ण भट्ट की साहित्यिक पत्रकारिता से प्रभावित रही हूँ। जहाँ साहित्य और पत्रकारिता गले मिल रही हो, वह दृश्य कितना सुहावना होता है। इसे पण्डित जी ने ‘हिन्दी प्रदीप’ के माध्यम से कर दिखाया था। लगातार ३२ वर्ष से अधिक समय तक किसी पत्रिका का एक व्यक्ति-द्वारा सम्पादन और प्रकाशन, और वह भी अर्थाभाव मे, कितने दुस्साहस का कार्य है, जिसे भट्ट जी ने कर दिखाया था।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– पं० बालकृष्ण भट्ट अत्यन्त हठधर्मी थे। उनके पिता बेनीप्रसाद भट्ट एक व्यापारी थे, जिनकी तीव्र इच्छा थी कि उनका बेटा भी उनके व्यवसाय को आगे बढ़ाये, जो बालकृष्ण को बिलकुल रास नहीँ आता था। इस विषय को लेकर आयेदिन गृहक्लेश भी होता था, जिससे तंग आकर बालकृष्ण ने घर का त्याग कर दिया था; क्योँकि उनके मन-मस्तिष्क मे साहित्य और पत्रकारिता ने घर कर लिया था। वे भटके बहुत; परन्तु एक हज़ार से अधिक निबन्ध लिखकर और ‘हिन्दी प्रदीप’ का अनवरत तीन दशक से अधिक की अवधि तक कुशल सम्पादन करके अपना नाम स्वर्णाक्षरोँ मे अंकित करा गये। तभी तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने उन्हेँ ‘हिन्दी का स्टील’ कहा था; क्योँकि स्टील के चरित्र की ही तरह से उन्होँने अपना जीवन-यापन किया था।

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