कमलेश मिश्र ( वरिष्ठ पत्रकार )
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि उसमें सत्ता की आलोचना भी लोकतंत्र का ही हिस्सा मानी जाती है। पर जब देश पर शासन करने वाले ही बार-बार यह कहने लगें कि लोकतंत्र खतरे में है, तो यह बात आम नागरिक को चौंकाती भी है और सोचने पर मजबूर भी करती है। सवाल उठता है कि खतरा किससे है, और खतरे की घंटी बजा कौन रहा है?
आजादी के बाद से भारत में लोकतंत्र को कई दौर से गुजरना पड़ा है। आपातकाल के दौर में लोकतंत्र पर सबसे सीधा हमला हुआ था, जब नागरिक अधिकारों को कुचल दिया गया था। उसके बाद से हर दौर में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ने एक-दूसरे पर लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया है। कभी विपक्ष कहता है कि सत्ता तानाशाही की ओर बढ़ रही है, तो कभी सत्ता पक्ष कहता है कि कुछ ताकतें देश के लोकतंत्र को बदनाम करने की साजिश कर रही हैं। इस बहस में लोकतंत्र खुद कहीं पीछे छूट जाता है।
शासन करने वालों की ओर से लोकतंत्र पर खतरे की बात के पीछे कई तर्क दिए जाते हैं। पहला तर्क यह है कि विदेशी ताकतें, सोशल मीडिया और कुछ बुद्धिजीवी वर्ग देश की छवि को खराब करके लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा तोड़ना चाहते हैं। दूसरा तर्क यह है कि वंशवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति ने लोकतंत्र की जड़ों को खोखला किया है। तीसरा तर्क यह है कि चुनावों में झूठी खबरों, अफवाहों और नकारात्मक प्रचार के जरिए जनता को गुमराह किया जा रहा है। इन तर्कों में कुछ सच्चाई भी हो सकती है, क्योंकि लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं है, बल्कि संस्थाओं पर भरोसे का नाम है।
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि जो लोग सत्ता में हैं, उनके हाथ में ही लोकतंत्र की रक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। उनके पास संसद है, प्रशासन है, पुलिस है, एजेंसियां हैं और मीडिया तक पहुंच है। ऐसे में यदि वे ही कहें कि लोकतंत्र खतरे में है, तो यह उनकी अपनी विफलता का कारण जैसा लगता है। आलोचक यह भी पूछते हैं कि यदि लोकतंत्र खतरे में है, तो उसे बचाने के लिए सत्ता क्या ठोस कदम उठा रही है? क्या विपक्ष की आवाज को दबाना, पत्रकारों पर दबाव बनाना, या संस्थाओं का राजनीतिक इस्तेमाल लोकतंत्र को मजबूत करेगा?
असल में लोकतंत्र को खतरा किसी एक दल, एक नेता या एक विचारधारा से नहीं है। उसे खतरा तब होता है जब जनता उदासीन हो जाती है। जब वोट जाति, धर्म और मुफ्त की घोषणाओं पर पड़ने लगे, जब सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहा जाने लगे, जब न्याय, चुनाव आयोग, मीडिया और संसद जैसी संस्थाएं अपना स्वतंत्र स्वर खोने लगें, तब लोकतंत्र भीतर से कमजोर होने लगता है। यह कमजोरी धीरे-धीरे आती है, इसलिए दिखाई नहीं देती।
भारत का लोकतंत्र इसलिए अब तक टिका है, क्योंकि यहां की जनता ने हर बार सत्ता को बदलकर यह साबित किया है कि अंतिम फैसला जनता का ही होता है। जनता ने बड़े-बड़े नेताओं को सत्ता से हटाया है और नए लोगों को मौका दिया है। यही लोकतंत्र की असली ताकत है। इसलिए सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी को भी लोकतंत्र को खतरे में बताकर जनता को डराने के बजाय, लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए।
लोकतंत्र को बचाने का सबसे सरल तरीका है, संविधान का पालन, संस्थाओं का सम्मान और असहमति का सम्मान। यदि शासक ही कहेंगे कि लोकतंत्र खतरे में है, तो उन्हें पहले यह बताना होगा कि वे उसे बचाने के लिए क्या कर रहे हैं। केवल भाषणों से लोकतंत्र नहीं बचता, उसे रोज के फैसलों से बचाना पड़ता है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि लोकतंत्र कोई इमारत नहीं है, जो एक बार बन गई तो हमेशा खड़ी रहेगी। यह एक जीवित परंपरा है, जिसे हर पीढ़ी को अपने व्यवहार से सींचना पड़ता है। शासक हों या शासित, सबकी जिम्मेदारी है कि वे इस परंपरा को कमजोर न होने दें।