आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य में बैंकिंग व्यवस्था सहयोगी बने, बाधक नहीं : रजनीकांत श्रीवास्तव

प्रयागराज। भारतीय जनता पार्टी एनजीओ प्रकोष्ठ के प्रांत सह-संयोजक रजनीकांत श्रीवास्तव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत, लोकल फॉर वोकल और स्वदेशी के संकल्प को वर्ष 2047 तक विकसित एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का आधार बनाया गया है। इस संकल्प को जमीन पर उतारने में छोटे उद्यमियों, एमएसएमई, कारीगरों, स्थानीय उत्पादकों और ओडीओपी से जुड़े उद्यमों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन उद्यमों को मजबूत बनाने में बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

श्रीवास्तव ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP), क्रेडिट गारंटी योजनाओं, ODOP तथा अन्य एमएसएमई-केंद्रित योजनाओं के माध्यम से युवाओं, छोटे उद्यमियों, कारीगरों और स्थानीय उत्पादकों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही हैं। PMEGP जैसी योजनाओं का उद्देश्य ही नए सूक्ष्म उद्यम स्थापित कर रोजगार एवं स्वरोजगार को बढ़ावा देना है।

उन्होंने कहा कि योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य केवल ऋण वितरित करना नहीं, बल्कि एक सफल और टिकाऊ उद्यम खड़ा करना होना चाहिए। जमीनी स्तर पर कई बार ऐसी परिस्थितियां सामने आती हैं, जहां व्यवसाय पूरी तरह स्थापित होने, उत्पादन शुरू होने, बाजार विकसित होने और पर्याप्त कैश फ्लो बनने से पहले ही ऋण की वसूली का दबाव बढ़ जाता है। इससे नया उद्यमी आर्थिक ही नहीं, बल्कि मानसिक दबाव में भी आ जाता है।

उन्होंने कहा कि बैंक का पैसा सुरक्षित रहना आवश्यक है, लेकिन ऋण लेने वाले उद्यमी का व्यवसाय सुरक्षित रहना भी उतना ही आवश्यक है। यदि किसी नए उद्यम को खड़ा होने का पर्याप्त अवसर ही नहीं मिलेगा तो वह बैंक का ऋण समय पर कैसे चुका पाएगा?

श्रीवास्तव ने कहा कि किसी ऐसे उद्यम के विरुद्ध कठोर वसूली कार्रवाई या संपत्ति संबंधी कार्रवाई, जिसने अभी उत्पादन और कारोबार की वास्तविक शुरुआत ही नहीं की है, उस स्थिति में अत्यंत गंभीर प्रश्न खड़े करती है। उन्होंने कहा कि कारोबार शुरू होने से पहले ही यदि उद्यमी पर कर्ज का बोझ और वसूली का दबाव इतना बढ़ जाए कि वह अपना उद्यम ही बंद करने को मजबूर हो जाए, तो यह आत्मनिर्भर भारत की भावना के विपरीत है। इसे आर्थिक उद्यमिता की ‘भ्रूण हत्या’ जैसी स्थिति बनने से रोकना होगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य बैंक और उद्यमी के बीच टकराव पैदा करना नहीं है। बैंक और उद्यमी एक-दूसरे के पूरक हैं। बैंक का पैसा तभी सुरक्षित होगा जब उद्यमी का व्यवसाय चलेगा, उत्पादन बढ़ेगा, रोजगार पैदा होगा और बाजार विकसित होगा।

बैंक अधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी

श्रीवास्तव ने कहा कि कई बार शाखा स्तर के प्रबंधक, क्षेत्रीय/जोनल स्तर के अधिकारी और उच्च अधिकारियों के बीच समुचित समन्वय न होने के कारण भी उद्यमियों की समस्याएं बढ़ जाती हैं। एक ही मामले में अलग-अलग स्तरों से अलग-अलग दिशा-निर्देश मिलने पर उद्यमी असमंजस में पड़ जाता है और उसका समय तथा व्यवसाय दोनों प्रभावित होते हैं।

उन्होंने कहा कि बैंकिंग व्यवस्था में समन्वय, संवाद, शिष्टाचार और व्यवहारिक दृष्टिकोण को मजबूत करने की आवश्यकता है। उद्यमी को भी बैंक के नियमों, दस्तावेजों और वित्तीय अनुशासन का पूरी तरह पालन करना चाहिए, लेकिन बैंक अधिकारियों से भी अपेक्षा है कि वे उद्यमी की वास्तविक परिस्थिति को समझते हुए समाधानपरक दृष्टिकोण अपनाएं।

उन्होंने कहा कि किसी उद्यमी को यह कहना कि “आप प्राइवेट बैंक चले जाएं” एक सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था में उचित एवं न्यायोचित व्यवहार नहीं माना जा सकता। बैंकिंग व्यवस्था का उद्देश्य ग्राहक और उद्यमी को बाहर का रास्ता दिखाना नहीं, बल्कि नियमों के दायरे में उसकी समस्या का समाधान तलाशना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की एक बड़ी जिम्मेदारी है। ‘एक देश—एक विकास दृष्टि’ और सबका साथ, सबका विकास की भावना के अनुरूप बैंकिंग व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें उद्यमी स्वयं को सहयोगी व्यवस्था का हिस्सा महसूस करे।

ऋण देने के साथ व्यवसाय को खड़ा करने की जिम्मेदारी भी समझनी होगी

श्रीवास्तव ने कहा कि योगी सरकार ODOP, MSME और स्वदेशी उत्पादन से जुड़े उद्यमों में कई बार शुरुआती अवधि में मशीनरी, भवन, कच्चा माल, स्टाफ, मार्केटिंग और बाजार तैयार करने में समय लगता है। इसलिए ऋण की संरचना भी परियोजना की वास्तविक प्रकृति और कैश फ्लो को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि बैंक को ऋण स्वीकृत करने से पहले ही नहीं, बल्कि ऋण देने के बाद भी उद्यम की प्रगति को समझने और आवश्यक मार्गदर्शन देने की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। इससे बैंक का जोखिम भी कम होगा और उद्यमी के सफल होने की संभावना भी बढ़ेगी।

सरकार और RBI से प्रमुख मांगें

रजनीकांत श्रीवास्तव ने केंद्र सरकार, राज्य सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से आग्रह किया कि—

1. ODOP, MSME और स्वदेशी उत्पादन से जुड़े नए उद्यमों के लिए परियोजना की प्रकृति के अनुसार व्यवहारिक मॉरेटोरियम और पुनर्भुगतान व्यवस्था पर विचार किया जाए।

2. कारोबार शुरू होने और पर्याप्त कैश फ्लो बनने से पहले छोटे उद्यमियों पर अनावश्यक वसूली दबाव को कम करने के लिए स्पष्ट एवं व्यवहारिक दिशा-निर्देश बनाए जाएं।

3. वास्तविक कठिनाई झेल रहे लेकिन संभावनाशील उद्यमों के लिए restructuring/re-scheduling की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए।

4. प्रत्येक जिले/क्षेत्र में MSME एवं ODOP उद्यमियों के लिए विशेष बैंकिंग सहायता प्रकोष्ठ या नोडल व्यवस्था विकसित की जाए।

5. शाखा, क्षेत्रीय कार्यालय, जोनल कार्यालय और उच्च अधिकारियों के बीच समन्वय की ऐसी व्यवस्था बने जिससे उद्यमी को एक ही विषय पर बार-बार अलग-अलग अधिकारियों के चक्कर न लगाने पड़ें।

6. बैंक अधिकारियों की कार्यप्रणाली में शिष्टाचार, संवाद और समाधानपरक व्यवहार को प्राथमिकता दी जाए तथा उद्यमियों की शिकायतों के लिए समयबद्ध grievance redressal mechanism प्रभावी बनाया जाए।

7. सरकारी योजनाओं के अंतर्गत ऋण प्राप्त करने वाले उद्यमियों को केवल ऋण तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें मार्केटिंग, डिजिटल बिक्री, प्रशिक्षण, ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने की दिशा में भी सहयोग दिया जाए।

8. सरकार और बैंकिंग व्यवस्था मिलकर यह समीक्षा करें कि आत्मनिर्भर भारत, ODOP, MSME और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाओं का लाभ वास्तव में उद्यमी तक पहुंच रहा है या केवल ऋण वितरण के आंकड़ों तक सीमित है।

“उद्यमी मजबूत होगा तो बैंक का पैसा भी सुरक्षित होगा”

श्रीवास्तव ने कहा कि सरकार की योजनाओं का अंतिम उद्देश्य रोजगार, उत्पादन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता को मजबूत करना है। यदि कोई युवा या छोटा उद्यमी अपना व्यवसाय खड़ा करने के लिए बैंक से ऋण लेता है तो उसे केवल ‘ऋण खाता’ नहीं, बल्कि भविष्य का रोजगारदाता और आर्थिक विकास का भागीदार समझा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “बैंक और उद्यमी के बीच विश्वास का संबंध जितना मजबूत होगा, बैंक का पैसा उतना ही सुरक्षित होगा। उद्यमी को मजबूत करके ही बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों से स्वदेशी अपनाने, लोकल फॉर वोकल और आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देने का आह्वान कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यदि स्थानीय उत्पाद बनाने वाला छोटा उद्यमी वित्तीय दबाव में अपना कारोबार बंद करने को मजबूर हो जाए, तो आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य कैसे पूरा होगा?

श्रीवास्तव ने कहा कि वर्ष 2047 के विकसित एवं आत्मनिर्भर भारत का सपना केवल बड़ी कंपनियों से नहीं, बल्कि गांव, कस्बे और जिले के छोटे उद्यमी, कारीगर, व्यापारी और स्थानीय उत्पादक मिलकर पूरा करेंगे। इसलिए बैंकिंग व्यवस्था को भी इन उद्यमियों के साथ साझेदार की भूमिका निभानी होगी।

उन्होंने कहा कि आवश्यकता बैंक बनाम उद्यमी की नहीं, बल्कि बैंक और उद्यमी के बीच विश्वास, संवाद और सहयोग की है। यदि सरकार, बैंक और उद्यमी मिलकर काम करें तो ऋण भी सुरक्षित रहेगा, रोजगार भी बढ़ेगा, स्थानीय उत्पादन भी मजबूत होगा और 2047 के आत्मनिर्भर भारत का संकल्प वास्तविक अर्थों में साकार होगा।

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